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अलवर के जसविंदर ने वकालत छोड़ खेती को बनाया व्यवसाय

कानून की पढ़ाई करने वाले जसविंदर सिंह ने अचानक वकालत छोड़कर खेती व्यवसाय अपनाने का फैसला किया और उनके इस फैसले ने उनका जीवन ही नहीं बदला बल्कि क्षेत्र के किसानों को भी नया रास्ता दिखा दिखा दिया है।
राजस्थान में अलवर जिले के मालाखेड़ा ब्लॉक के कैरवाड़ा गांव के प्रगतिशील किसान जसविंदर सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी करके वकालत शुरू की और न्यायिक सेवा में जाने का सपना देखा था, लेकिन वृद्ध और अस्वस्थ पिता की जिम्मेदारी ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
उन्होंने शहर की नौकरी और न्यायिक सेवा का सपना छोड़ पुश्तैनी खेती को अपनाया। अब वही फैसला उन्हें अलवर में हल्दी की खेती का अग्रदूत बना चुका है। उनकी सफलता देखकर अब आसपास के किसान भी पारंपरिक खेती से हटकर मसाला फसलों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
जसविंदर सिंह ने खेती को केवल आजीविका नहीं, बल्कि विज्ञान और नवाचार का माध्यम बनाया। खेती में उतरने के बाद उन्होंने आधुनिक तकनीकों को सीखने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र नौगांव, महाराष्ट्र के बारामती स्थित कृषि विज्ञान केंद्र, पूसा फार्म दिल्ली और उद्यान विभाग के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शिकरत की। वैज्ञानिक तरीकों को अपनाते हुए उन्होंने बूंद बूंद सिंचाई, पलवार, प्लास्टिक की सुरंग तकनीक से टमाटर, बैंगन, करेला जैसी सब्जियों की खेती शुरू की, जिससे उन्हें बेहतर उत्पादन और अच्छा लाभ मिला।
सब्जियों में सफलता के बाद जसविंदर सिंह ने मसाला फसलों में हाथ आजमाया और हल्दी की खेती को चुना। शुरुआती वर्षों में सीमित क्षेत्र में प्रयोग करने के बाद जब अच्छे परिणाम मिले तो उन्होंने पिछले वर्ष एक बीघा में करीब तीन क्विंटल हल्दी की गांठों की रोपाई की। खेत की तैयारी में 50 क्विंटल गोबर की खाद डाली गई, पौधों के बीच 15 सेंटीमीटर की दूरी रखी गई और चार बार निराई-गुड़ाई और मिट्टी चढ़ाने के साथ 10 से 15 सिंचाई की गई।
करीब आठ से नौ महीने बाद उन्हें 50 क्विंटल हल्दी का उत्पादन मिला। अलवर सब्जी मंडी में औसतन 35 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से बिक्री कर उन्होंने पौने दो लाख रुपये की सकल आय अर्जित की। करीब 60 हजार रुपये की लागत निकालने के बाद उन्हें एक लाख 15 हजार रुपये का शुद्ध लाभ हुआ। एक बीघा में मिली इस सफलता ने उनके हौसले को नई उड़ान दी।
पहले ही प्रयास में मिली सफलता के बाद जसविंदर सिंह ने इस वर्ष हल्दी की खेती का रकबा बढ़ाकर साढ़े चार बीघा कर दिया है। मई और जून में रोपाई की जा चुकी है और आने वाले आठ-नौ महीनों में फसल तैयार होगी। उनकी खेती देखने और तकनीक समझने के लिए आसपास के गांवों के किसान लगातार उनके खेत पहुंच रहे हैं। कई किसानों ने छोटे-छोटे हिस्सों में हल्दी की खेती शुरू भी कर दी है।
उद्यान विभाग के सहायक कृषि अधिकारी मनोज कुमार जैन बताते हैं कि अलवर में हल्दी की खेती अभी शुरुआती दौर में है। अधिकतर किसान खरीफ और रबी की पारंपरिक फसलों पर ही निर्भर रहते हैं और मसाला फसलों की खेती में कम रुचि दिखाते हैं। हालांकि कुछ किसान एक-दो क्यारियों में हल्दी लगाते रहे हैं, लेकिन बड़े क्षेत्र में व्यावसायिक स्तर पर खेती करने वाले किसानों की संख्या बहुत कम है। ऐसे में जसविंदर सिंह का प्रयास जिले के लिए एक नई शुरुआत माना जा रहा है।
जसविंदर सिंह केवल हल्दी तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने खेती में फसल विविधीकरण को अपनाते हुए 0.75 हेक्टेयर में मौसमी का बगीचा लगाया है। इसके अलावा शकरकंद, मशरूम, घीया, काशीफल और तोरई जैसी फसलें भी उगा रहे हैं। उनकी खेती से करीब 10 लोगों को नियमित रोजगार भी मिल रहा है।
खेती में नवाचार और वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने के लिए सरकार ने आत्मा योजना के तहत जसविंदर सिंह को जिला स्तरीय उद्यानिकी पुरस्कार से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके पिता ने ग्रहण किया, जो उनके लिए सबसे भावुक क्षणों में से एक था।
विशेषज्ञों के अनुसार अलवर की बलुई दोमट, जीवांशयुक्त और जल निकास वाली मिट्टी हल्दी की खेती के लिए उपयुक्त है। किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती करें तो हल्दी जिले में आय बढ़ाने वाली प्रमुख नकदी फसल बन सकती है।
जिस युवा ने कभी न्यायिक सेवा का सपना देखा था, वही आज खेतों में नवाचार की मिसाल बन गया है। जसविंदर सिंह ने साबित कर दिया कि खेती को वैज्ञानिक सोच, आधुनिक तकनीक और मेहनत के साथ किया जाए तो यह किसी भी पेशे से कम सम्मानजनक और लाभदायक नहीं है। उनकी सफलता अब अलवर में हल्दी की खेती की नई पहचान बन रही है और जिले के किसानों को पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर फसल विविधीकरण अपनाने की प्रेरणा दे रही है।

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